अयोध्या का सरकारी दीपोत्सव सबालों के घेरे में ।
दीपोत्सव को राज्यस्तरीय सरकारी मेले का दर्जा देने और उसके लिए एक करोड़ तैंतीस लाख की धनराशि का प्रावधान करने के साथ ही उसने पर्यावरणवादियों की इस मांग को हवा में उड़ा दिया है कि इस दीपोत्सव के कारण अयोध्या में हो रहे वायु व ध्वनि प्रदूषणों का मापन कराया जाये और पर्यावरण को हो रहे नुकसान के मद्देनजर दीपोत्सव का स्वरूप परिवर्तित किया जाये।अयोध्या में सामाजिक सरोकारों को लेकर प्रायः संघर्ष करते रहने वाले डाॅ. महेन्द्र सिंह याद दिलाते हैं कि 2018 के सरकारी दीपोत्सव के दौरान हुई भारी आतिशबाजी ने धर्मनगरी के पर्यावरण का बहुत बुरा हाल किया था । उम्मीद थी कि प्रदेश सरकार उक्त बुरे हाल का अध्ययन कराकर उससे सबक लेगी और इस बार के दीपोत्सव में संयम बरतेगी । लेकिन वह जिस तरह उसे गिनीज बुक ऑफ रेकॉर्ड्स में फिर से जगह दिलाने के लिए पहले से ज्यादा 'भव्य' बनाने को बेकरार है, उससे इस तरह की उम्मीदें सर्वथा नाउम्मीद होकर रह गई हैं।इससे पहले शिकायतकर्ताओं के ऐसे ही एक पत्र का संज्ञान लेकर संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूनाइटेड नेशंस इन्वायरान्मेंट प्रोग्राम) ने भी केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को पत्र लिखा था।लेकिन उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इस सिलसिले में अब तक क्या व्यवस्था की, यह शिकायतकर्ताओं समेत किसी की भी जानकारी में नहीं है।