दलितों के खिलाफ विभिन्न अपराधों का वर्गीकरण
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की 2017 के आंकड़ों पर आधारित नवीनतम रिपोर्ट की सर्वाधिक दिलचस्प विशेषताओं में से एक है ।
*दलितों के खिलाफ विभिन्न अपराधों का वर्गीकरण*,
जिसमें कि अब अपमान को भी शामिल कर लिया गया है । बहुचर्चित रहे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 में अपमान और सामाजिक बहिष्कार की अवधारणा को विस्तार से समझाया गया है । खासकर जाति के संदर्भ में, अपमान की कई परतें होती हैं.दलित समुदाय की पर्याप्त स्वीकृति नहीं होने की वजह है– संवेदना का नितांत अभाव. यही अंततः अपमान और बहिष्कार का कारण बनता है । दलितों का अपमान भारत में रोज़मर्रा की बात है । इसके जरिए सामाजिक पदानुक्रम में उन्हें उनकी 'औकात' बताने की कोशिश की जाती है । जब अपमान की बात आती है, तो आइए देखें कि कैसे नौकरियों में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लोगों के साथ भेदभाव होता है ?
अहम फैसले लेने वाले पदों, जो कि मायने रखते हैं, में दलितों का प्रतिनिधित्व बहुत ही कम है । नौकरशाही, थिंक टैंक, मीडिया, न्यायपालिका और अकादमिक क्षेत्रों में ऊंचे स्तरों पर अभी तक दलितों की पर्याप्त भागीदारी नहीं नज़र आती है । वर्ष 2018 की एक रिपोर्ट में कहा गया है: 'थोराट और एटवेल के 2010 के एक अध्ययन में पाया गया कि समान योग्यता वाले एससी और उच्च जाति के आवेदकों (प्रत्येक लगभग 4800) में से एससी आवेदकों को साक्षात्कार के लिए बुलाए जाने की संभावना 67 प्रतिशत कम थी । इससे भी ज़्यादा चिंता की बात है कम योग्यता (स्नातक) वाले उच्च जाति के आवेदकों को उनसे अधिक योग्यता (पोस्ट-ग्रेजुएट) वाले एससी उम्मीदवारों के मुकाबले कहीं अधिक अनुपात में इंटरव्यू के लिए बुलाया जाना.' इससे ज्यादा अपमानजनक और क्या हो सकता है? यदि आप अनुसूचित जाति के हैं, तो अधिक कुशल और सक्षम होने के बाद भी आपको इंटरव्यू कॉल आने की संभावना कम है. इस स्थिति के बावजूद, योग्यता संबंधी दलील को सामाजिक रूप से वंचित समुदायों के लोगों के खिलाफ बाकायदा अपमान के साधन के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है.