संपादकीय- एक नयी पहल।

संपादकीय,


एक नयी पहल।


भारत में जातीय विषमता और धार्मिक असहिष्णुता विद्यमान है। कहने को तो भारत की विविधता में एकता का संदेश दिया जाता है लेकिन हकीकत कुछ और ही है। जातीय विषमता और धार्मिक असहिष्णुता के चलते भारत कभी एक राष्ट्र नहीं बन पाया। दुर्भाग्य से विविधता में एकता बनाए रखने के लिए कोई कारगर उपाय भी नहीं किए गए। न जाने कितने महापुरुष इस भारत भूमि पर जन्म लिए जिन्होनें समाज सुधार के लिए अपनी सारी जिंदगी लगा दी लेकिन नतीजा वही *ढाक के तीन पात*।
संत कबीर, संत तुकाराम, नामदेव, संत रविदास, महात्मा फुले, पेरियार छत्रपति शाहूजी महाराज, गाडगे बाबा, महात्मा बुद्ध, राहुल सांकृत्यान, बाबा साहेब अंबेडकर, मान्यवर कांशीराम आदि अनेक विभूतियों ने अपने अपने अंदाज़ में बहुजन समाज को अंध विश्वास और पाखण्ड से मुक्त करने के लिए जाग्रत किया लेकिन निष्कर्ष ? वही
*नौ दिन चले अढ़ाई कोस* और *खोदा पहाड निकली चुहिया*।
महापुरुषों की एक लम्बी फेहरिस्त है, सब खप गए लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिली।
अक्सर मैंने लोगों को कहते सुना है कि जिस दिन ओबीसी जाग गया उस दिन भारत पर बहुजन का राज होगा। सदियां गुज़र गईं अभी तक जागे ही नहीं, कब जागेंगे। कुंभकर्ण तो फिर भी छ: महीनों के बाद जाग जाता था। ये तो सदियों से सोए हुए हैं। कोई बात नहीं, सोते रहो अगर तुम्हें सोने में ही आनंद का अनुभव हो रहा है। लेकिन एक बात स्पष्ट है कि जो सोते रहते हैं उनकी आने वाली पीढ़ी निश्चित ही कंगाल हो जाएगी और गुलामी करने के अतिरिक्त और कोई चारा ही नहीं बचेगा। मुझे तो नहीं लगता है कि ओबीसी कभी जागेगा भी। कुछ लोगों का मानना है कि ओबीसी धीरे धीरे जाग रहा है। अगर जागने की गति इतनी धीमी है ,तो सब कुछ लुट गया फिर जागे तो क्या फायदा।
*तब पछताए क्या होऎगा? जब चिडियां चुंग जाऎ खेत*।
अब बहुजनों के राजनीतिक दलों को एकजुट होकर एक सार्थक रणनीति बना लेनी चाहिए। और ऎसा  बुद्धिमान प्रबुद्ध नेता चुन लेना चाहिए जो समस्या का हल निकाल सके और हेमलिन के पाइपर की तरह चूहों को मोहित कर अपने पीछे पीछे चलने को मजबूर कर एक नया विकासशील मार्ग प्रशस्त कर सके।
                          पत्रकार सुसीम