एक वरिष्ठ पत्रकार की कसमकस !

 


 


 


 


आज के परिवेश में पत्रकारिता एक ऎसा व्यवसाय व धारणा तथा विचार धारा बन चुकी है कि वरिष्ट तत्वदर्शी पत्रकार भी देश,समाज व राजनॆतिक विश्लेषण करने में भ्रमित हो जाते हैं। वरिष्ठ पत्रकार वीरेन्द्र यादव जिन्होंने पत्रकारिता की डिग्री करके कयी प्रतिष्ठित पत्रों मे पत्रकारिता की और अब अपना आखबार निकालने के साथ साथ राजनीति,समाज व देश की दशा पर कयी पुस्तकें भी लिख रहे हैं।


आज उनसे पत्रकारिता के सन्दर्भ में हुई बातचीत के कुछ अंश।


 


हम बहुत टेंशन में हैं इन दिनों
------- ------------
‘वीरेंद्र यादव न्यूज’ का नया कलेवर भारी पड़ना लगा है। नये कलेवर के दूसरे अंक में ही सांस फूलने लगी है। अभी तीसरे अंक की तैयारी कर रहे हैं। एक कहावत है न – आ बैल मुझे मार। उसी दौर से गुजर रहे हैं। हम समझ रहे थे कि शुभेच्छुओं से विज्ञापन लेना आसान होगा। लेकिन उल्टा पड़ गया। विज्ञापन छापने के बाद वसूली भी कम मुश्किल काम नहीं है। हालांकि आशान्वित होने का भी अपना आनंद है। डुबते को तिनका का सहारा मिल ही जाता है।
हम तिनके के सहारे ही संभावनाओं का दरिया पार करने की कोशिश कर रहे हैं। अपने जीवन की शुरुआत हमने भैंस की चरवाही से की थी और आज ‘भैंसा लड़ाई’ के मैदान में हैं। राजनीतिक पत्रकारिता भैंसा की लड़ाई देखने जैसा ही है। यहां सभी एक-दूसरे के ‘दुश्मन’ ही हैं। दोस्ती तीसरे से दुश्मनी साधने के लिए की जाती है। एक बार हमने मुखिया का उपचुनाव लड़ा था। हम बाहरी उम्मीदवार थे। हमने चुनाव के नाम पर 20 दिन बर्बाद किया। 20 सौ रुपये खर्च हुए थे और वोट भी आया मात्र 20 (बीस)। इन 20 दिनों में हमें समझ आया कि राजनीति तपस्या है। इसमें तन, मन और धन सब कुछ न्योछावर करना पड़ता है। राजनीति में महिलाओं के लिए तन (देह) की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। बिहार विधान मंडल की एक पूर्व सदस्य थीं रमणिका गुप्ता। कोयलांचल से अपनी राजनीति की शुरुआत की थीं और राजधानी तक पहुंचीं। कोयलांचल से सत्ता के गलियारे तक की यात्रा में कई पड़ाव लांघती गयीं। इस यात्रा में देह उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। रमणिका गुप्ता खुद अपनी आत्मकथा लिखी हैं। पुस्तक का नाम है- आपहुदड़ी। इस पुस्तक में उन्होंने बिहार के प्रमुख नेताओं के नाम के साथ अपनी ‘देह यात्रा’ की चर्चा की है। इस पुस्तक की समीक्षा और कुछ अंश आप हमारी  पुस्तक ‘राजनीति की जाति’ में भी पढ़ सकते हैं। रमणिका गुप्ता का अनुभव किसी एक महिला का दर्द नहीं है, बल्कि पूरी राजनीतिक महिला जमात की पीड़ा है।
हम कह रहे थे कि राजनीति एक तपस्या है। इसमें लोग टिकट, सीट और वोट खरीदने के लिए करोड़ों रुपये फूंक देते हैं। करोड़ों रुपये के डूबने का जोखिम उठाना किसी तपस्या से कम नहीं है। सौभाग्य से जीत गये तो वसूलने की अनंत संभावना। विधान सभा में बहुमत लटक (हंग) जाये तो सोने पे सुहागा। इस लोकतंत्र में नीति, निष्ठा और सिद्धांत के साथ सरकार तक बिक जाती है।
हम भी ठहरे ठेठ अहीर। कहां से कहां पहुंच गये। हम बात कर रहे थे अपने टेंशन की और पहुंच गये नेताओं के टेंशन पर। हमारा टेंशन यह है कि विज्ञापन काफी कम मिल रहा है। पिछले 15 दिनों में अभी एक भी विज्ञापन नहीं मिला है। 31 जनवरी तक फरवरी अंक को ऑनलाइन करना पड़ेगा। 10 दिनों में कितना विज्ञापन मिल पायेगा, कहना मुश्किल है। दिसंबर अंक से हमने विज्ञापन लेने की शुरुआत की है। विज्ञापन के बाजार का एकदम नया अनुभव है। इससे भी परेशानी हो रही है। इस कार्य में कोई सहयोग भी नहीं मिल पा रहा है। हम सरकारी विज्ञापन भी नहीं लेते हैं। अकेले कंटेंट, विज्ञापन और बाजार को झेलना पड़ रहा है। पत्रिका के लिए शुभेच्छुओं से मिलने वाला आर्थिक सहयोग भी थम-सा गया है। इसी वजह से हमारा टेंशन बढ़ गया है। हालांकि उम्मीद की किरण भी इसी अनिश्चित संभावनाओं से निकलेगी, यही भरोसा है। और भरोसा कायम भी रहेगा।