अम्बेडकर वाद की दिशा और दशा


 




*अम्बेडकरवाद की दशा व दिशा !*

 

       भेदवादी समाज दर्शन में भेद की दृष्टि तो है ही, इसमें दो चीजें ओर प्रमुख हैं | इसमें पहली है अस्त्रों का निर्माण |आदि काल में जब व्यक्ति जंगलों में रहता था, तब उसे जानवरों से अपनी रक्षा के लिए अस्त्र की आवश्यकता पड़ती थी | यह उचित भी था | आदमी एक अहिंसक प्राणी है | उसके ना तो दांत और ना ही नाखून नुकीले हैं, जिससे वह दूसरों पर हिंसक हो सके | इस कारण से वह दूसरे पर न तो हमला कर सकता था ना ही अपनी रक्षा | इसलिए अस्त्र की खोज स्वभाविक थी | अब नगर विकसित हो गए हैं, व्यक्ति पहले से ज्यादा सभ्य भी हो गया है | उसकी सुरक्षा के लिए सरकार की तरफ से व्यवस्था भी कर दी गई है | इस स्थिति में अब अस्त्र रखना गैर आवश्यक है गया है |   

      पर मनुष्य तो मनुष्य है | उसके पास विकसित मस्तिष्क व मन भी है | इस कारण से मनुष्य ने नई समस्या को जन्म दे दिया है | उसने अस्त्र के जखीरे खड़े कर दिए हैं | अब समस्या पैदा हो गई है कट्टर विचारधाराओं के कारण | और एक ऐसी विचारधारा जो मनुष्यों में जन्म से ही भेद करके चलती आई है | इस विचारधारा ने जन्म से श्रेष्ठ व निम्नता को प्रतिष्ठित कर दिया है | यह विचारधारा न केवल भेद करके चलती है, बल्कि अपनी विचारधारा को अस्त्रों के माध्यम से बलात मनवाने पर भी तुली हुई है | किसी विचारधारा को समझा बुझा के राजी करना तो उचित है, पर इसके लिए अस्त्र के माध्यम से भय दिखा कर बात मनवाना अनुचित ही नहीं असभ्य भी है | भेदवादी समाज दर्शन ने इसे कभी भी सहज ढ़ग से, स्वभाविक ढ़ग से लागू नहीं किया है, ना कभी भविष्य में कभी कर सकती है | 

   

अतीत में इसे लागू करने के लिए मनुस्मृति जैसा घिनौना ग्रंथ लिख कर व इसमें अमानवीय श्लोक जोड़ कर ही इसे लागू किया जा सका है | वर्तमान में अभी यूपी के जिला बुलन्दशहर में आरएसएस ने एक मिलिट्री टाइप स्कूल खोला है | जो ट्रेनिंग फौज को मिलिट्री में मिलती है, वैसी ही ट्रेनिंग स्कूल में देने की व्यवस्था की गई है | देश में आरएसएस ऐसे बीस हजार स्कूल खोलने जा रही है | आरएसएस का चिंतन व क्रियान्वयन मनुस्मृति को ध्यान में रखकर किया जा रहा है | वे अपने लक्ष की तरफ बढ़ रहे हैं | उनका भेदवादी समाज दर्शन यूं हीं नहीं फल फूल रहा है | वे भौतिकता के पूर्ण मार्ग का क्रियान्वयन कर रहे हैं | इसके अतिरिक्त भेदवादी संस्कृति में शक्ति की पूजा है | चाहे वह आध्यात्मिक शक्ति हो या भौतिक शक्ति | भेदवादियों ने आध्यात्मिक शक्तियों का भौतिकता के लिए दुरुपयोग करने में भी कोई गुरेज नहीं किया है | शस्त्र पूजन इस संस्कृति का धार्मिक अनुष्ठान है | विजय दशवी के दिन शस्त्रोंं की पूजा की जाती है | जितने भी देवी देवता व अवतार हैं सभी को अस्त्रों से लैश करके दिखाया गया है | श्रीकृष्ण जी की तो राजकीय सेना भी थी | उनकी सेना का नाम "नारायणी सैना" था | क्या अस्त्रों से लैश समाज में निहत्था समाज अपनी रक्षा कर सकता है ? यह एक अम्बेडकरवादियों से मेरा ज्वलन्त प्रश्न है ?

        

      भेदवादी समाज दर्शन का दूसरा जोर शास्त्रों पर है | उन्होंने मनुष्य की बुद्धि को नियंत्रित करने के लिए शास्त्रों का निर्माण किया है | जो व्यक्ति जैसा पढ़ेगा या सुनेगा, उसकी बुद्धि वैसी ही निर्मित हो जाएगी | बुद्धि के अनुरूप ही व्यवहार का निर्माण होता है | तो तीन चीजें रही भेदवादी समाज दर्शन में | पहला अस्त्र, दूसरा शास्त्र, और तीसरा भेद | पहले शस्त्र बनाया, फिर शास्त्र बनाए, उसके बाद भेद के आधार पर इसे लागू किया | तीनों के गुणधर्म व स्वभाव एक समान हैं | तीनों ही शक्तियों के प्रतीक हैं | एक अस्त्र की शक्ति, दूसरा शास्त्र की शक्ति, तीसरा भेद की शक्ति | एक बाहुबल की स्थूल शक्ति, बाकी दोनों शूक्ष्म बौद्धिक शक्तियां |

   

        पहले शस्त्र अस्तित्व में आए, बाद में शास्त्र फिर भेद | ये तीनों एक दूसरे के पूरक हैं | स्थूल व शूक्ष्म इन दोनों के विशेषज्ञ अलग अलग हैं | शूक्ष्म का अगुआ ब्राह्मण है और स्थूल का अगुआ क्षत्री | ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं | क्षत्री (स्थूल) ब्राह्मण (शूक्ष्म) की रक्षा करता है और ब्राह्मण, क्षत्री की | दोनों एक दूसरे के बिना अपूर्ण हैं | इन दोनों में ब्राह्मण, शूक्ष्म (शास्त्र) श्रेष्ठ है | क्षत्री, स्थूल (अस्त्र) इसके नीचे है | ये दोनों भेदवादी व्यवस्था के मूल व आधार स्थम्भ हैं | इसलिए वर्णव्यवस्था में इन दोनों को श्रेष्ठ की संज्ञा दी गई है | ये दोनों वर्ग ही बाकी के समाज (वैश्य व शूद्र) को संचालित करते हैं | नीचे के दोनों पायदान साधन मात्र हैं | इनकी वर्णव्यवस्था में कोई निर्णायक भूमिका भी नहीं है |       

       अब आते हैं अम्बेडकर वाद पर | अम्बेडकरवाद की क्या तैयारी है, भेदवाद को विकल्प देने की ? इसका अवलोकन करके देख लेते हैं | अम्बेडकरवाद को दो तल पर काम करना था | सबसे पहले उसे शिक्षा के साथ साथ आत्मसुरक्षा के लिए अस्त्रों की भूमिका को पहचानना था | यह पहली चूक हुई है | भगवान बुद्ध के कैई सो वर्षों तक बुद्ध का मार्ग सहज ढ़ग से चलता रहा | उसके बाद भिक्खुओं पर मार्ग में हमले होने लग गए | इसका निराकरण करने के लिए भत्ते बोधिधर्म ने आत्मसुरक्षा की तकनीक को धर्म से जोड़ दिया | प्रश्न है, आत्मसुरक्षा की तकनीक को बुद्ध ने क्यों नहीं जोड़ा ? बाद में बोधिधर्म ने ही क्यों जोडा ?

        पहली बात तो यह है कि बुद्ध चेतना का पूरा जोर दुख विमुक्ति के मार्ग पर ही केंद्रित करना चाहते थे | दुख विमुक्ति के मार्ग पर चलने के लिए चेतना के दो केंद्र नहीं बनाए जा सकते हैं | चेतना एक दिशा में ही निर्बाध रूप से कार्य कर सकती है | दूसरा बुद्ध के समय के आस पास  इसकी तत्काल कोई आवश्यकता नहीं समझी गई | बुद्ध ने अपने लिए सुरक्षा की कोई मांग नहीं की | न ही अपने श्रावक संघ के लिए किसी राजा से सुरक्षा की व्यवस्था करवाई | बुद्ध पर हमले हुए, तब भी किसी राजा से इसकी शिकायत नहीं की | धम्म असुरक्षा में जीने का नाम है | किसी भी भिक्षु के दीक्षा लेने पर वे साधना करने अरण्य में, जंगल के एकान्त में चले जाते थे | असुरक्षा जागने में सहायक होती है | जितना आदमी सुरक्षित होता जाएगा, उतना ही बेहोश व लापरवाह भी होता जाएगा | धम्म का मार्ग आहिस्ता आहिस्ता जागकर ही पाटना होता है | जब तक सम्भव हो असुरक्षा में जिए | इसलिए बुद्ध ने अपने आस पास सुरक्षा का ढाचा खड़ा नहीं किया

 

       | कई सो साल तक यही प्रक्रिया चलती रही | एक सीमा ऐसी आ गई जब भत्ते बोधिधर्म को सुरक्षा की तकनीक इजाद करनी पड़ी | वह भी निहत्थी | मार्ग दृष्टा को काल व परिस्थिति के अनुरूप उचित समय पर उचित फैसले लेने होते हैं | इसी कड़ी में आज बर्मा के भिक्खुओं को अपनी जान माल की रक्षा के लिए अस्त्र उठाने पड़े | बुद्धत्व का प्रभाव जब अपने शिखर पर था, तब उनके प्रभाव के कारण सारा वातावरण अहिंसक हो गया था | अकेले अर्हत प्राप्त भिक्खु सारिपुत्र के ही अस्सी हजार श्रावक व उपासक देवत्व की अवस्था को प्राप्त हो गए थे | बुद्ध के होने का ऐसा जबरदस्त प्रभाव (Effect) सारे वातावरण में छा गया था | समय के अन्तराल में किसी भी महापुरुष का प्रभाव मनुष्यों में क्षीण होने लगता है | इस आत्मसुरक्षा का फैंसला भारत में "झेन" परम्परा से जन्मे अट्ठाइसवें सद्गुरू भत्ते बोधिधर्म को लेना पड़ा | इस आत्मसुरक्षा की तकनीक को विश्व के बौद्ध देशों ने तो ग्रहण कर लिया, परन्तु आज तक भी अम्बेडकरवाद ने ऩहीं अपनाया है | यह पहली जबरदस्त चूक अम्बेडकरवाद से हुई है | इसके परिणामस्वरूप भारत के बौद्ध, बौद्धिक तल पर तो विकास कर रहे हैं, परन्तु उनके अन्दर एक योद्धाओं जैसा आत्मविश्वास नहीं जग पा रहा है | 

        दूसरी चूक हमसे शास्त्रों के तटस्थ निर्माण करने पर हुई है | सारा साहित्य कुण्ठाओं से भरा पड़ा है | वर्तमान साहित्य में पूर्वाग्रह, अलगाव व घृणा परिलक्षित हो रही है | तटस्थता कहीं भी देखने को नहीं मिल पाती | सारी चेतना जैसे अतीत से जकड़ चुकी है | चिंतन भविष्योंन्मुखी है ही नहीं | अब हमें क्या करना है, इसकी तरफ ध्यान ही नहीं जा पा रहा है | इसका कारण क्या है ? ऐसा क्यों हो रहा है ? इसका कारण हम ध्यान व मैत्री भावना को अम्बेडकरवाद से जोड़ने में चूक गए हैं | ध्यान में वह शक्ति है, जो व्यक्ति की चेतना को भूत व भविष्य से हटा कर वर्तमान में लाकर खड़ी कर देती है | जब भूत व भविष्य पीछे छूट जाएगें, तब राग व द्वेष भी स्वत: ही पीछे छूट जाएगें | जब राग द्वेष ही नहीं रहेगें, तब अतीत का अलगाव व घृणा भी तिरोहित हो जाएगी | फिर क्या शेष रह जाएगा ? तब जाकर तटस्थता का उदय हो पाएगा | इस तटस्थता के आलोक में ही साहित्य (शास्त्रों) का निर्माण किया जाना चाहिए था | ध्यान से न जुड़ने के कारण ही अम्बेडकरवादी मैत्री भावना ले वंचित रह गए हैं | अलगाव व घृणा की भावना, मैत्री भावना के ना होने से ही पैदा हो रही है | अम्बेडकरवाद का सारा चिंतन अतीत में हुई ज्यादती का बदला लेने पर पहुंच गया है |

          पहले अम्बेडकरवादी श्रेष्ठ साहित्य का निर्माण करें | श्रेष्ठ साहित्य का निर्माण तब तक नहीं कर पाएगें जब तक ध्यान साधना से उन्हें नहीं जोड़ा नहीं जाएगा | श्रेष्ठ बुद्धि का निर्माण उच्च स्तर की चेतना से होता है | जितना ज्यादा होश होगा, उतनी ही बुद्धि शूक्ष्म व व्यापाक होकर विकसित होगी | होश का सीधा सम्बन्ध ध्यान के अभ्यास से है ।

 

        आपने कभी ख्याल किया, शासन क्षत्री करता है, राजनीति क्षत्री करता है, उसकी नीति ब्राह्मण बनाता है | ऐसा क्यों ? ऐसा इसलिए है कि जो राजनीति में फंसा होगा, वह तनाव में रहेगा | तनाव के कारण उसकी बुद्धि शूक्ष्म व व्यापक रूप नहीं ले पाएगी | इसलिए नीति बनाने वाला राजनीति के बाहर होना चाहिए | वह केवल ऱाजनीति का अवलोकन भर करता रहे | भारत की नीति के अधिकतर ग्रंथ ब्राह्मणों द्वारा ही लिखे गए हैं | फौज में कमाण्डर बन्दूक नहीं चलाता | बन्दूक चलाने के लिए विभिन्न स्तर के सिपाही लगे होते हैं | कमाण्डर केवल निर्देश देता है | 

       अम्बेडकरवादियों को दो स्तरीय कार्य प्रणाली अपनाने की जरूरत है | उन्हें ऐसे साहित्यकारों का सर्जन करना होगा, जो लेखन के साथ साथ ध्यानी भी हों | तभी श्रेष्ठ साहित्य का निर्माण हो सकता है | दूसरा है अपनी व लोक की रक्षा के लिए अस्त्रों का निर्माण करना | उन्हें ऐसे परम्परागत अस्त्रों का निर्माण करना होगा जो वैध हैं | अस्त्र व शास्त्र एक दूसरे के पूरक हैं | बिना शस्त्रों के तो शास्त्रों (शिक्षा) की रक्षा नहीं की जा सकती और बगैर शास्त्रों के शस्त्रों (आत्मसुरक्षा) को दिशा नहीं मिल पाएगी | दोनों विषय एक दूसरे से जुड़े हुए हैं | वर्तमान में मौजूद अम्बेडकरवाद इस कसौटी पर खरा नहीं उतर पा रहा है | वह ध्यान से न जुड़ पाने के कारण स्तरीय नहीं है | अम्बेडकर साहित्य में शायद ही कोई साहित्यकार हो जो ध्यान से जुड़ा हो | सारा साहित्य राग द्वेष में ग्रसित होकर लिखा जा रहा है | सारा साहित्य अलगाव व पूर्वाग्रह से भरा पड़ा है | पहले साहित्यकार ध्यान से जुड़े | अपना राग द्वेष कम करें | उसके बाद तटस्थ होकर लिखें | यह अम्बेडकरवाद से दूसरी चूक हुई है | 

          हमने कभी ब्राह्मण का विधायक पक्ष भी जाना है ? हमने केवल निन्दनीय पक्ष ही जाना है | ब्राह्मण का ज्जवल पक्ष भी है, जिसके कारण वह बुद्घ से जुड़ कर श्रमण संस्कृति का पैरोकार बन गया | इस पक्ष की अम्बेडकरवादी अभी तक अवहेलना करते आए हैं | ब्राह्मण हमेशा से ध्यान साधना, नाम सुमरण, पूजा पाठ से जुड़ा रहा है | कोई भी इस देश में शासक आए-गए, परन्तु उसने अपनी धार्मिक सम्पदा (संस्कृति) को नहीं छोड़ा | इसका क्या परिणाम निकला ? उसने अपने आप को व अपनी संस्कृति को अक्षुण्य बनाए रखा | वह शरीर से तो गुलाम रहा, परन्तु उसकी चेतना स्वतंत्र रही | उसी स्वतंत्र चेतना के कारण वह अपने कपड़े झाड़कर फिर खड़ा हो गया | देश आजाद होने पर अपनी संस्कृति को विकसित करने में लग गया | आज वह सत्ता पर काबिज है | 

         अम्बेडकरवाद धरातल पर आरएसएस के मुकाबले कहीं भी नहीं ठहरता है | अम्बेडकरवादी अपने मिशनरी स्कूल खोलें, जिसमें विद्यार्थियों के लिए रोजगार परक शिक्षा तो हो ही साथ में आत्मसुरक्षा के आधार पर मिलिट्री टाइप ट्रेनिंग भी दी जाए | तभी अम्बेडकरवाद आरएसएस का विकल्प बन सकता है | नहीं तो खाली अलगावद ही बना रहेगा

       क्योंकि वे ध्यान से नहीं जुड़ पाए हैं, इसलिए इनमें मैत्री भावना का अभाव है | ध्यान व मैत्री भावना आपस में जुड़े हुए हैं | मैत्री भावना निर्मित न होने के कारण ही इनमें अलगाव व घृणा की भावना घर कर गई है | सम्पूर्ण साहित्य अतीत में हुई ज्यादती का बदला लेने के भाव से भरा पड़ा है | मेरा अम्बेडकरवादियों से दूसरा प्रश्न यह है कि उनके पास जिनको वे अपना कहते हैं और जिनको अपना नहीं भी कहते, उन्हें आपस में जोड़ने का उनके पास कौनसा सूत्र है ? पहले आपस में वे तो जुड़ें जिनको वह अपना कहते हैं, जब हम इनको ही नहीं जोड़ पा रहें तो दूसरों को कैसे जोड़ पाएगें ? जोड़ने के बाद ही तो अगला कदम संगठन का उठ पाएगा | संघर्ष की बात तो अभी कोसों दूर है | शिक्षित होने मात्र से जुड़ाव पैदा नहीं हो सकता | शिक्षा मात्र बौद्धिक होती है | खाली बुद्धि जोड़ नहीं सकती | बुद्धि तो यंत्र मात्र है | बुद्धि लाभ हानि का  हिसाब ही लगा पाती है | इसके साथ मन के माध्यम से भाव भी तो विकसित हो | यह तीसरी चूक है जो अम्बेडकरवादियों से हो रही है |

       मैने अपनी चर्चा में भेदभाव से उपजी संस्कृति के तीन बिन्दुओं को उठा कर, उनका विकल्प प्रस्तुत करने का प्रयास किया है | अस्त्रों का विकल्प मिशनरी स्कूल खोलकर व सामाजिक व सांस्कृतिक संगठनों के द्वारा बुद्ध विहारों में आत्मसुरक्षा की तकनीक का अभ्यास कराना है | शास्त्रों का निर्माण ध्यान साधना में उतरकर तटस्थता को धारण करके करना होगा | समाजों को जोड़ने के लिए मैत्री भावना को साथ रखकर आगे बढना होगा |

        किसी भी व्यक्ति या समाज में देने का भाव ही जोड़ सकता है | बुद्ध का सम्पूर्ण मार्ग देने के भाव पर टिका है | बौद्धिकता एक तल है व्यक्तित्व के विकास का | अम्बेडकरवाद की यात्रा अभी तक इस तल पर ढ़ग से भी नहीं पहुंच पाई है | अभी तो इसके आगे दो तल और शेष हैं | इसकी कोई झलक अम्बेडकवाद में नजर नहीं आ रही है | बुद्धि स्वार्थ सिखाती है | यह लाभ के मार्ग को ही समझ पाती है | अम्बेडकरवाद को वैश्विक स्तर पर आने के लिए "भाव" व "चेतना" को भी जानना होगा | वर्तमान में अम्बेडकरवाद में जो इतना बिखराव दिख रहा है, व अनेक संगठनों में विभाजित हो रहा है, इसका कारण व्यक्तित्व का अधूरापन है | किसी भी समाज में  व्यक्ति का व्यक्तित्व ही अधूरा है, तो फिर उसका सर्वागीण विकास कैसे हो पाएगा ? इसके अभाव में मिशन अपने लक्ष तक कैसे पहुंच पाएगा, सोचिये ?

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