समसामयिक

परिद्रश्य


अब आज अगर तुम शांत रहे,
तो कल खामोशी छा जाएगी।
हर घर में अब आग लगेगी,
 मानवता सब जल जाएगी। 


सन्नाटे  बस  शेष  रहेंगे,
अब त्राहि त्राहि मचने बाली।
अब भी अगर न जागे तुम,   
फिर पीढी  गुलाम बनने बाली। 


अब जागो तुम अरि मर्दन को,
अब समय है परिवर्तक बनने का।
दलित बनाया जिसने तुमको,
पद दलित उसे अब करने का।


१-१ पर १०-१० भारी हो,
तुम्हें नहीं अब  डरना है ,
श्रेष्ठ साहसी  सच्चे  हो,
तुम्हें नहीं अब मरना है।


कुर्बानी दे दो अब तुम खुद की, 
निज खून से सीचों बागों को,
अंतर ज्वाला धधकाओ  तुम,
और जला लो अंतर आगों को।


है सत्ता तुम्हें पुकार रही, 
परिवर्तन ले लो हाथों में। 
बैलेट बुलेट हथियाओ दोनो,
अब धार लगाओ दातों में। 


अधिकार तुम्हारे छीने जो,
लगा दो उनके घर में आग।
मचा  दो  त्राहि-त्राहि तुम,
सोते हुए जाऎं सब जाग।


            सुसीम