नारी और उसका अन्तर्मन
एक स्त्री और पुरुष प्रेम कर रहे हैं।
पुरुष अपने को थका लेता है।
और "स्त्री" प्रेम करने के बाद और अधिक समृद्ध और पोषित हो जाती है।
क्योंकि वह ग्रहणशील है।
प्रेम करने में पुरुष अपनी शक्ति खोता देता है और स्त्री उसे प्राप्त कर लेती है।
यही कारण है कि पूरे संसार में स्त्रियों को दबा कर दमित करके रखा जाता है।
यदि उन्हें दबा कर न रखा जाये तो वे पुरुषों को मार ही डालें।
किसी भी पुरुष का, किसी भी स्त्री को संतुष्ट कर पाना असम्भव है। अब आधुनिक खोजी कहते हैं स्त्रियों के पास संभोग के कई उच्च शिखर होते हैं।
एक स्त्री रात में एक दर्जन पुरुषों से प्रेम कर सकती है और फिर भी ताजगी का अनुभव करती है और ऊर्जा से भरी रहती है।
एक पुरुष केवल एक बार प्रेम करने में थक जाता है। पुरुष अपनी ऊर्जा बाहर फेंकता है और स्त्री उस ऊर्जा को ग्रहण कर लेती है।
बाउल कहते हैं— ‘‘स्त्रैण" बनकर ग्रहणशील हो जाओ।
यही कारण है कि स्त्री कभी भी प्रेम प्रसंगों में पहला कदम नहीं उठाती—वह उठा ही नहीं सकती। और यदि एक स्त्री प्रेम प्रसंगों में पहल करती है तब उसे स्त्री— मुक्ति— आदोलन का एक भाग होना चाहिए।
तब वह किसी तरह अपना स्त्रीत्व खो रही है। वह प्रतीक्षा करती है। "पहल पुरुष की ओर से होना चाहिए" ।
स्त्री प्रतीक्षा करती है—ऐसा नहीं, कि वह प्रेम नहीं करती, वह अत्यधिक प्रेम करती है।
कोई पुरुष भी उतनी गहराई से प्रेम नहीं कर सकता—लेकिन वह प्रतीक्षा करती है। वह विश्वास करती है कि चीजें अपने ठीक समय पर घटित होगी, और शीघ्रता करना ठीक नहीं है।
एक स्त्री तनावमुक्त होती है,और
ऊर्जा से भरी हुई।
इसीलिए स्त्री में एक सौंदर्य होता है।
स्त्री प्रक्रति है,जननी है,कल्याणी है,रचनाकार है,यानी स्त्री ही संपूर्ण प्रक्रति है।
स्त्री शरीर की गोलाई केवल शारीरिक चीज नहीं है —ऐसा ही उसके मनोविज्ञान में भी है।
उसकी आकृति गोलाई लिए हुये, चिकनी, उष्ण और धुल जाने को तैयार होती है, लेकिन आक्रामक नहीं होती।
एक विश्लेषण नारी के प्राकृतिक अन्तरमन का।
(सुसीम अज्ञात)